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Sunday, October 31, 2010

दो दोस्त


दुनिया की इस भीड़ में, मंजिल की ओर निकल पड़े,
कुछ कर  दिखाने  के , होंसले लिए हुए,
अडचनों को लांघते , पर्वतो को चीरते,
कठिनाइयों की डगर पर , एक दूजे का साथ निभाते रहे |


तन में उनके जोश था, मन में एक विशवास था, 
ना हार का ही डर था, बस जीत का विशवास था,
सपनो की दुनिया को , वो हकीकत में बदलते गये,
कामयाबी के शिखर पर, वो बढ़ते गये बढ़ते गये |


आसान नही थी राह उनकी, रूकावटे अनेक थी ,
पर जीतने का जज्बा था, कुछ कर दिखने की चाह थी, 
सोच थी अलग उनकी, सबसे अलग पहचान थी ,
रोका बहुत दुनिया ने उन्हें, पर मंजिलो में ही उनकी जान थी |



मित्रता की मिसाल वो, इस दुनिया को सिखाते गये,
परिश्रम ओर विशवास से, मंजिल के करीब आते गये,
खुदा से ज्यादा उन्हें, खुद पर विशवास था,
क्योंकि उनकी मंजिल में ही, उनके खुदा का वास था |


धनं से था न मोह उन्हें,  बस अलग पहचान की आस थी,
यही थी मंजिल उनकी, यही उनकी प्यास थी ,
आखिर वो दिन आ गया, शहनाइया  बजने  लगी,
मंजिल उनके सामने थी, कामयाबी कदम चूमने लगी |


विजय गीत बजने लगे, आसमान भी गूंज उठा, 
जीत की ख़ुशी में, संसार थम सा गया ,
बन गये मिसाल वो, देश को उन पे नाज था,
परिश्रम  ओर विशवास ही उनकी विजय का राज था |


Dedicated to my friends
            ---- डिम्पल शर्मा 

4 comments:

  1. दोस्ती के बारे में कितनी अच्छी बातें.... थैंक्स

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  2. very inspirational poem, u really a great poet !!!

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